May 20, 2026
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श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 27 अगस्त 2023। इस बार रक्षाबंधन पर राखी बांधने को लेकर समय का असमंजस बना हुआ है। इसी को लेकर क्षेत्र के ज्योतिषविद् राजगुरु पंडित देवीलाल उपाध्याय ने श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स को शास्त्रों के अनुसार जानकारी दी है। उपाध्याय ने बताया कि सनातन संस्कृति के भाई-बहन के पावन पर्व रक्षाबंधन इस वर्ष दिनांक 30 अगस्त 2023, बुधवार को मनाया जाएगा। बुधवार को चंद्रमा प्रात: 10:15 बजे तक मकर राशि में रहेंगे एवं तत्पश्चात कुंभ राशि में प्रवेश करेंगे। बुधवार को प्रातः 10:55 बजे उपरांत पूर्णिमा तिथि आरंभ हो जाएगी जो गुरुवार को प्रातः 7:02 बजे तक रहेगी।

सुकर्मा योग- आचार्य ने बताया कि बुधवार ज्योतिषी गणना के अनुसार सुकर्मा नामक योग भी बन रहा है। जो अपने आप में एक विशेष योग है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सुकर्मा योग को मांगलिक कार्यों के लिए विशेष शुभ माना जाता है। आचार्य ने बताया कि इस वर्ष रक्षाबंधन के दिन सुकर्मा योग का आगमन अपने आप में एक शुभ संकेत है। मान्यताओं के अनुसार इस योग में किए गए कार्य शीघ्र ही सफल होते हैं। आचार्य ने बताया कि यह सुकर्मा योग बुधवार को रात्रि 21 बजकर 28 मिनट 24 सैकेंड से आरंभ होगा जो संपूर्ण रात्रि को भी रहेगा।

भद्रा दोष परिहार
राजगुरु पंडित देवीलाल उपाध्याय ने बताया कि बुधवार को रक्षाबंधन के पावन पर्व के दिन भद्रा काल श्रीडूंगरगढ़ समय अनुसार प्रातः 10:55 बजे से आरंभ होगा जो रात्रि 20:58 बजे तक रहेगा। इस वर्ष भद्रा का निवास स्थान मृत्यु लोक में होने के कारण यह भद्राकाल कुछ विद्वानों के मत के अनुसार अशुभ माना गया है। किंतु उपाध्याय के अनुसार मुहूर्त मार्तण्ड, शीघ्र बोध, मुहूर्त चिंतामणि, बाल बोध, कल्पद्रुम
आदि ज्योतिष शास्त्र के प्रमुख विख्यात ग्रंथों में बताया गया है कि
मध्यानात परत: शुभम् अर्थात्
भद्रा काल के दिन उस दिन के मध्याह्न काल (दोपहर 12:34 बजे उपरांत) के बाद आवश्यक कार्य किया जा सकते हैं। अतः इस दिन दोपहर के 12:34 बजे के बाद रक्षाबंधन करना शास्त्र सम्मत है।

रक्षाबंधन का शुभ समय
1. (चंचल वेला)- सायं 3:43 से 5:17 बजे तक
2.(लाभ वेला)- सायं 5:18 से 6:52 बजे तक
3. (शुभ एवं अमृत वेला)-रात्रि 8:59 से 11:08 बजे तक

4.विशेष शुभ समय
(सुकर्मा योग युक्त शुभ एवं अमृतवेला)
रात्रि 9:29 से 11:08 बजे तक

पंडित रामदेव उपाध्याय ने रक्षाबंधन का पौराणिक रहस्य बताया। 

श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। उपाध्याय ने रक्षाबंधन का पौराणिक रहस्य बताते हुए बताया कि हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार हजारों साल पहले राखी बांधने का प्रचलन शुरू हुआ था। सबसे पहली राखी या रक्षासूत्र राजा बलि को बांधा गया था। राजा बलि को मां लक्ष्मी ने रक्षासूत्र बांधकर अपना भाई बनाया था। राजा बलि ने जब 100 यज्ञ पूर्ण कर स्वर्ग का राज्य छीनने का प्रयास किया तो देवराज इंद्र ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से भिक्षा में तीन पैर जमीन मांगी। भगवान ने दो पैर में ही पूरी धरती एवं ब्रह्मांड नाप डाला और फिर तीसरा पैर देने के लिए तब राजा बलि से कहा तो इस पर राजा बलि समझ गया कि वामन रूप में दिख रहा यह याचक कोई साधारण याचक नहीं है। तीसरे पैर के रूप में राजा बलि ने अपना सिर भगवान विष्णु के आगे झुका दिया। इससे भगवान विष्णु राजा बलि की भक्ती से प्रसन्न हो गए और वरदान मांगने को कहा। तो राजा बलि ने मांगा कि भगवान स्वयं उसके दरवाजे पर रात दिन खड़े रहें। ऐसा होने के बाद भगवान विष्णु राजा बलि के पहरेदार बन गए। कहा जाता है कि काफी दिनों तक भगवान स्वर्गलोक वापस नहीं पहुंचे तब माता लक्ष्मी ने राजा बलि के पास जाकर उन्हें रक्षासूत्र बांधा और उसे अपना भाई बनाया। मां लक्ष्मी ने राजा बलि से उपहार स्वरूप अपने पति भगवान विष्णु को मांग लिया। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा थी। तब से अभी तक बहनें अपने भाई को राखी बांधती हैं और इसके बदले में भाई से रक्षा का वचन लेती हैं।

यही कारण है कि रक्षाबंधन पर या रक्षासूत्र बांधते वक्त जो मंत्र पढ़ा जाता है उसमें राजा बलि को रक्षा बाधंने को याद दिलाया जाता है-
मंत्र – “येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:। तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।”

राजगुरु पंडित देवीलाल उपाध्याय (ज्योतिष विद्)
09414429246