






देश का बजट कल वित्त मंत्री ने संसद में पेश किया। जिसे डिजिटल इंडिया की तरफ बढ़ता ठोस कदम भी कहा गया है। कोरोना ने लोगों के कदम जाम कर दिए और शिक्षा भी थम सी गई। स्कूल, कॉलेज भी कम ही खुल पाये। इस हालत में शिक्षा को भी ऑनलाइन करने की कोशिश बजट में की गई है। ये बात दिखने में तो बहुत सुंदर लग रही है मगर व्यवहार में कितनी फलीभूत होगी, इस पर संशय है। क्योंकि बजट की घोषणाओं को जमीन पर उतरते कम ही देखा गया है।
ऑनलाइन शिक्षा के लिए केंद्रीय बजट में इस बार डिजिटल यूनिवर्सिटी खोलने की घोषणा की गई है। जिसके जरिये लोगों तक शिक्षा पहुंचाने का लक्ष्य बताया गया है। मगर जानकर संशय जता रहे हैं कि इस तकनीक और उसके लिए सामग्री को तैयार करना बड़ी चुनोती है। इस शिक्षा के लिए देश को तैयार करना टेढ़ी खीर है। क्योंकि भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा गांव में रहता है जो अब भी आधुनिक तकनीक से फ्रेंडली नहीं है। कहीं ये बड़ा तबका शिक्षा में पिछड़ न जाये या यूं कहें कि पीछे न रह जाये। गरीबों की अधिक संख्या उनको शिक्षा में पिछड़ा ही न बना दे। शहरी छात्र जो तकनीक से फ्रेंडली है वो तो लाभ ले लेगा मगर गांव का छात्र लाभ से वंचित रह जायेगा। उस तक ये माध्यम पहुंचाने का जिम्मा कौन लेगा? दिखने में डिजिटल यूनिवर्सिटी की घोषणा अच्छी लग रही है मगर कारगर कितनी होगी, इस पर संशय के बादल भी साफ दिख रहे हैं।
इसी तरह केंद्रीय बजट में बताया गया है कि पीएम ई- विद्या के 200 चैनल शुरू किये जायेंगे जो बच्चों की पढ़ाई के नुकसान की भरपाई करेंगे। बताया गया है कि ये चैनल क्षेत्रीय भाषाओं में होंगे। बात भाषा, संस्कृति की दृष्टि से अच्छी लगती है, मगर राजस्थानी, भोजपुरी, भुटी जैसी भाषाओं को तो अभी तक केंद्र सरकार ने संवैधानिक मान्यता भी नहीं दे रखी है। फिर कौनसी क्षेत्रीय भाषा का उपयोग होगा, ये बड़ा सवाल है। क्षेत्रीय भाषाओं में मान्यता के अभाव में शिक्षा का पाठ्यक्रम तैयार करना भी बड़ी समस्या है।
यदि केंद्र सरकार अपनी इन बजट घोषणाओं को सच में हर छात्र तक पहुंचाना चाहती है तो उसे सबसे पहले राजस्थानी सहित सभी क्षेत्रीय भाषाओं को संवैधानिक मान्यता देनी चाहिए तभी वो इस दिशा में आगे कदम रख सकती है। यदि केंद्र सरकार की मंशा साफ है तो फिर राजस्थानी सहित सभी क्षेत्रीय भाषाओं को मान्यता मिल जायेगी, तभी तो पाठ्यक्रम तैयार होगा और इन चैनलों का उपयोग हो सकेगा। पीएम ई- विद्या योजना भी कारगर होगी। राजस्थानी भाषा के हिट चिंतकों को इस घोषणा से एक उम्मीद हुई है, क्योंकि वे तो अपनी भाषा में शिक्षा की वकालत वर्षों से कर रहे हैं। सबकी ये ही दुआ है, बजट की ये घोषणा केवल घोषणा न रहे, उसे जमीन पर भी उतारा जाये।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार



