






केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दामों में आशातीत बढ़ोतरी के बाद चंद रुपये घटाकर जन आक्रोश पर पानी के छींटे डालने का प्रयास किया है, जिसे जनता भी समझ रही है। उसे संतोष भी नहीं हो रहा।
लोक सभा और विधान सभा के उप चुनावों में सदा की तरह परिणाम न मिलने से भाजपा नेतृत्त्व वाली केंद्र सरकार चिंतित हो गई। आने वाले दिनों में पांच राज्यों में विधान सभा चुनाव भी है, उससे भाजपा की घबराहट बढ़ी है। उसी घबराहट के चलते ये दाम घटाए गए हैं। जो ऊंट के मुंह में जीरे के समान है।
हिमाचल में भाजपा की सरकार है मगर वहां एक लोक सभा और तीन विधान सभा उप चुनाव में भाजपा को करारी शिकस्त मिली। राजस्थान में तो बहुत बुरी गत हुई। मुख्य विपक्षी दल होते हुए भी एक जगह चौथा स्थान मिला और जमानत जब्त हो गई। वहीं दूसरी सीट पर तीसरे स्थान पर रहकर संतोष करना पड़ा।
बंगाल में तो भाजपा की दुर्गति हुई, ममता के सामने पार्टी ठहर ही नहीं पाई। चारों विधान सभा उप चुनाव में भाजपा चारों खाने चित्त हुई। उसे मतदान का केवल 25 प्रतिशत मत मिला, ममता को 75 प्रतिशत।
ये सब निर्णय भाजपा नेतृत्त्व को हिलाने वाले थे। आनन फानन में पेट्रोल और डीजल के दामों में कुछ कमी की। मगर राज्यों के टैक्स के कारण जनता को राहत नहीं मिल पा रही है। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्र से दाम और घटाने का आग्रह ये कहकर किया कि दाम घटेंगे तो राज्यों में स्वतः टैक्स कम हो जायेगा। मगर केंद्र इस बात पर मौन है। पिछले दिनों ये तथ्य सामने आया कि पेट्रोल के सर्वाधिक दाम मध्य प्रदेश में और डीजल के सर्वाधिक दाम राजस्थान में वसूले जा रहे हैं। इससे दोनों राजनीतिक दलों की मंशा जनता को पता चल गई। मध्य प्रदेश सरकार ने तो टैक्स में कुछ कमी कर छवि सुधारने की कोशिश की है मगर राजस्थान सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया।
अर्थ शास्त्री पिछले दो साल से पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने का सुझाव दे रहे हैं ताकि इनके दामों में मनमर्जी की बढ़ोतरी न हो। मगर केंद्र सरकार इस सुझाव की उपेक्षा कर रही है। मजे की बात ये है कि कांग्रेस सहित अन्य दलों की राज्य सरकारें भी इस सुझाव के पक्ष में नहीं बोल रही।
इन हालातों को देखते हुए लगता है कि आने वाले राज्य विधान सभा चुनावों में एक लंबे अर्से बाद अन्य चुनावी मुद्दे गायब होंगे और महंगाई मुख्य मुद्दा बनेगी। ये जागरूकता दिख रही है और ये बात केंद्र की भाजपा नेतृत्त्व वाली सरकार के लिए शुभ संकेत नहीं।
– मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार



